Friday, 2 September 2016

Hindi Story भाग्य से बढ़कर पुरूषार्थ है ( Hard Work is Key to Success)

भाग्य से बढ़कर पुरूषार्थ है 

( Hard Work is Key to Success)


hard work is key to success hindi
Hard work lead to lead sucess
राजा विक्रमादित्य के पास सामुद्रिक लक्षण जानने वाला एक ज्योतिषी पहुँचा। विक्रमादित्य का हाथ देखकर वह चिंतामग्न हो गया। उसके शास्त्र के अनुसार तो राजा दीन, दुर्बल और कंगाल होना चाहिए था, लेकिन वह तो सम्राट थे, स्वस्थ थे। लक्षणों में ऐसी विपरीत स्थिति संभवतः उसने पहली बार देखी थी। ज्योतिषी की दशा देखकर विक्रमादित्य उसकी मनोदशा समझ गए और बोले कि 'बाहरी लक्षणों से यदि आपको संतुष्टि न मिली हो तो छाती चीरकर दिखाता  हूँ, भीतर के लक्षण भी देख लीजिए।' इस पर ज्योतिषी बोला - 'नहीं, महाराज! मैं समझ गया कि आप निर्भय हैं, पुरूषार्थी हैं, आपमें पूरी क्षमता है। इसीलिए आपने
परिस्थितियों को अनुकूल बना लिया है और भाग्य पर विजय प्राप्त कर ली है। यह बात आज मेरी भी समझ में आ गई है कि 'युग मनुष्य को नहीं बनाता, बल्कि मनुष्य युग का निर्माण करने की क्षमता रखता है यदि उसमें पुरूषार्थ हो, क्योंकि एक पुरूषार्थी मनुष्य में ही हाथ की लकीरों को बदलने की सामाथ्य होती है।'

F.W. Robertson ने कहा है-

It is not the situation which makes the man, but the man makes the situation. The slave may be a free man. The monarch may be a slave…

अर्थात स्थिति एवं दशा मनुष्य का निर्माण नहीं करती, यह तो मनुष्य है जो स्थिति का निर्माण करता है। एक दास स्वतंत्र व्यक्ति हो सकता है और सम्राट एक दास बन सकता है।

उपरोक्त प्रसंग से ये बातें प्रकाश में आती हैं-

hard work destiny hindi
You create your future by your Hard Work

  • हम स्वयं परिस्थितियों को अनुकूल या प्रतिकूल बनाते हैं, अपने विचारों से, अपनी सोच से। जो व्यक्ति यह सोचता है कि वह निर्धन है, तो उसके विचार भी निर्धन होते हैं। विचारों की निर्धनता के कारण ही वह आर्थिक रूप से विपन्न होता है। यह विपन्नता उसे इस कदर लाचार कर देती है, कि उसे धरती पर बिखरी संपन्नता नजर ही नहीं आती। नजर आते हैं सिर्फ संपन्न लोग, उनके ठाठबाट और शानो-शौकत जो उसे कुंठित करते हैं, जबकि उनसे प्रेरणा लेकर वह भी संपन्न होने की कोशिश कर सकता है। अतः जरूरत है अपनी सोच में बदलाव लाने की।

  • मन की स्थिती अजेय है, अपराजेय है। उसकी दृढ़ इच्छा-शक्ति मनुष्य को विवश कर देती है कि वह किसी की परवाह किए बिना अपने काम को जी-जान से पूरा करें, अपनी सामर्थ्य से उस काम को पूरा करे।

  • मनुष्य निर्धनता और संपन्नता का सम्बन्ध भाग्य से जोड़ता है। वह सोचता है कि जो सौभाग्यशाली है, लक्ष्य उस पर प्रसन्न रहती है और बदकिस्मती का मारा कोशिश करने के बावजूद निर्धन ही बना रहता है।


निष्कर्ष:

सफलता की मुख्य शर्त है- पुरूषार्थ। पुरूषार्थ करने से ही 'सार्थक जीवन' बनता है, केवल भाग्यवादी रहकर नहीं। भाग्य तो अतीत में किए गए कर्मों के संचित फलों का भूल है, जो मनुष्य को सुखःदुःख के रूप में भोगने को मिलते हैं और वे फल भोगने के पश्चात क्षीण हो जाते हैं। विशेष बात यह है कि भोग करने का समय भी निश्चित नहीं है। ऐसी स्थिति में वह कब तक भाग्य के भरोसे सुख की प्रतीक्षा करता रहेगा?

यथार्थ में पुरूषार्थ करने में ही जीवन की सफलता सुनिश्ति है, जबकी व्यक्ति भाग्य के सहारे निष्क्रियता को जन्म देकर अपने सुनहरे अवसर को नष्ट कर देता है। महाभारत के युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण यदि चाहते तो पांडवों को पलक झपकते ही विजय दिला देते, किन्तु वे नहीं चाहते थे कि बिना कर्म किए उन्हें यश मिले। उन्होंने अर्जुन को कर्मयोग का पाठ पढ़ाकर उसे युद्ध में संलग्न कराया और फिर विजय-श्री एवं कीर्ति दिलवाकर उसे लोक-परलोक में यशस्वी बनाया।

अतः आप विकास की नई-नई मंजिलें तय करने और उन्नति की पराकाष्ठा पर पहुँचने के लिए अपने पुरूषार्थ को कभी शिथिल न होने दें और पूर्ण उत्साह के साथ आगे बढ़ते रहें।

पुरूषार्थ उसी में है जो संकट की घड़ी में निर्णय लेने में संकोच नहीं करता।
                                                                         -वेदव्यास: महाभारत