Thursday, 25 August 2016

Hindi Story

अनमोल खजाना 

एक बहुत ही सिद्ध और विवेकशील महात्मा थे। एक बार उन्हें जमीन पर पड़ा हुआ एक पैसा मिला। महात्मा ने उसे उठा लिया। वे सोचने लगे- भिक्षा में मुझे भोजन तो मिल जाता है फिर क्यों मैंने यह पैसा उठा लिया? उन्होंने निश्चय किया कि यह पैसा वह सबसे गरीब आदमी को दान कर देंगे। महात्मा गरीब आदमी की तलाश में घूमते रहे, परंतु उन्हें कोई सुपात्र नहीं मिला।

एक दिन महात्मा जी घूमते-घूमते एक राज्य की राजधानी पहुंचे। उन्होंने देखा कि राजमार्ग पर राजा के साथ अस्त्र-शस्त्रों से सजी एक विशाल सेना चली आ रही थी। राजा महात्मा को पहचानता था। हाथी से उतरकर उसने महात्मा को प्रणाम किया। महात्मा ने कहा, 'राजन! आप अपना हाथ आगे करें।' फिर उन्होंने अपनी झोली से वह पैसा निकालकर राजा के दाएं हाथ पर रख दिया। राजा ने आश्चर्यचकित होकर महात्मा से पूछा,'महाराज! यह क्या है?' महात्मा ने उत्तर दिया, 'मैंने सोचा था यह पैसा मैं सबसे गरीब आदमी को दान करूंगा और वह गरीब आदमी तुम हो।'
राजा ने विनीत स्वर में कहा, 'महाराज! आपके आशीर्वाद से मेरे खजाने में हीरे-जवाहरातों का असीम भंडार है।' महात्मा ने उतर दिया, 'फिर भी राजन! तुम बहुत गरीब हो। यदि तुम्हारे खजाने में धन का भंडार है तो सेना लेकर क्यों जा रहे हो आक्रमण करने। युद्ध में कितने लोगों की जान जाएगी। यह सब किसलिए। मात्र राज्य विस्तार और धन के लिए। तब तुम से गरीब और कौन हो सकता है।'
महात्मा की बातें सुन राजा की नजरें शर्म से झुक गईं। उसने महात्मा के चरण स्पर्श करके अपनी सेना को लौटने का आदेश दिया। राजा सेना के पीछे चलते हुए मुट्ठी में बंद सिक्के को बार-बार देख रहा था। बिना युद्ध किए लौटने के बाद भी राजा को ऐसा लग रहा था मानो वह अनमोल खजाना जीतकर लौट रहा हो।
संकलन: राधा नाचीज